मोदी पर हंगामा क्यों है बरपा??
क्या भाजपा वास्तव में मोदी को प्रधानमन्त्री का दावेदार घोषित नहीं करना चाहती??
क्या ये सब ड्रामा महज़ मोदी को लगातार राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में बनाए रखने हेतु किया जा रहा सोचा समझा प्रपंच मात्र है???
क्या मोदी भाजपा की डूबती नैया के इकलौते काबिल साहिल हैं??
क्या राष्ट्र के रूप में भारत की समस्त समस्याओं का रामवाण सिर्फ और सिर्फ मोदी हैं???
क्या एक मोदी इतने बड़े देश को खा जायेंगे ???
मोदी को ये देश चुने या न चुने लेकिन उन्हें अस्वस्थ व् अलोकतान्त्रिक ढ़ंग से दौड़ में भाग लेने से प्रतिबंधित कर देना क्या न्यायपूर्ण है?? क्या ऐसा किया जाना हमारे संविधान की आत्मा के अनुकूल है??एक लोकतंत्र आधारित चुनावी व्यवस्था में देश के भविष्य का फैसला लेने का हक़ सिर्फ और सिर्फ वहां के आम नागरिकों का बनता है न कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी ठेकेदारों का.
मैं मोदी का समर्थक बिलकुल नहीं हूँ.....लेकिन,मोदी को हौव्वा बना कर रख देने तथा दूसरों को भी ऐसा मानने हेतु पूर्वपीठिका तैयार करने वालों के साथ भी कतई नहीं हूँ.
भारत की जनता भोली हो सकती है,भावुक हो सकती है,नासमझ भी हो सकती है,लेकिन.... एक राष्ट्र के रूप में भारत एक बहुत ही समझदार लोकतान्त्रिक इतिहास की विरासत समेटे हुए है. अगर कोई मोदी इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरुप व् सामजिक समरसतापूर्ण ताने-बाने केसाथ छेड़-छाड़ करने की हिमाकत भी करेगा तो उसके कान खींचने हेतु सर्वोच्च न्यायालय, संसद, मीडिया और हम यानि भारतीय नागरिक हैं न !!!
जब हमारी कोई दुधारू गाय या भैंस 'मरखा' यानि हमलावर हो जाती है तो कैसे सजगता और सूझ-बूझ के साथ उसका दूध निकाला जाता है.
यकीन जानिये-----न तो नरेंद्र मोदी वर्तमान समस्याओं को हल करने हेतु 'अलादीन का चिराग' साबित होंगे और न ही भारतीय लोकतंत्र हेतु 'फ्रेंकिसटीन का दानव'.
हाँ,वो एक कुशल प्रशासक के गुण रखते हैं,उनके अन्दर विद्द्यमान संभावनाओं के सजग संदोहन हेतु कारगर रणनीति बनाया जाना अधिक बेहतर व् सकारात्मक विकल्प होगा.
क्या भाजपा वास्तव में मोदी को प्रधानमन्त्री का दावेदार घोषित नहीं करना चाहती??
क्या ये सब ड्रामा महज़ मोदी को लगातार राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में बनाए रखने हेतु किया जा रहा सोचा समझा प्रपंच मात्र है???
क्या मोदी भाजपा की डूबती नैया के इकलौते काबिल साहिल हैं??
क्या राष्ट्र के रूप में भारत की समस्त समस्याओं का रामवाण सिर्फ और सिर्फ मोदी हैं???
क्या एक मोदी इतने बड़े देश को खा जायेंगे ???
मोदी को ये देश चुने या न चुने लेकिन उन्हें अस्वस्थ व् अलोकतान्त्रिक ढ़ंग से दौड़ में भाग लेने से प्रतिबंधित कर देना क्या न्यायपूर्ण है?? क्या ऐसा किया जाना हमारे संविधान की आत्मा के अनुकूल है??एक लोकतंत्र आधारित चुनावी व्यवस्था में देश के भविष्य का फैसला लेने का हक़ सिर्फ और सिर्फ वहां के आम नागरिकों का बनता है न कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी ठेकेदारों का.
मैं मोदी का समर्थक बिलकुल नहीं हूँ.....लेकिन,मोदी को हौव्वा बना कर रख देने तथा दूसरों को भी ऐसा मानने हेतु पूर्वपीठिका तैयार करने वालों के साथ भी कतई नहीं हूँ.
भारत की जनता भोली हो सकती है,भावुक हो सकती है,नासमझ भी हो सकती है,लेकिन.... एक राष्ट्र के रूप में भारत एक बहुत ही समझदार लोकतान्त्रिक इतिहास की विरासत समेटे हुए है. अगर कोई मोदी इसके धर्मनिरपेक्ष स्वरुप व् सामजिक समरसतापूर्ण ताने-बाने केसाथ छेड़-छाड़ करने की हिमाकत भी करेगा तो उसके कान खींचने हेतु सर्वोच्च न्यायालय, संसद, मीडिया और हम यानि भारतीय नागरिक हैं न !!!
जब हमारी कोई दुधारू गाय या भैंस 'मरखा' यानि हमलावर हो जाती है तो कैसे सजगता और सूझ-बूझ के साथ उसका दूध निकाला जाता है.
यकीन जानिये-----न तो नरेंद्र मोदी वर्तमान समस्याओं को हल करने हेतु 'अलादीन का चिराग' साबित होंगे और न ही भारतीय लोकतंत्र हेतु 'फ्रेंकिसटीन का दानव'.
हाँ,वो एक कुशल प्रशासक के गुण रखते हैं,उनके अन्दर विद्द्यमान संभावनाओं के सजग संदोहन हेतु कारगर रणनीति बनाया जाना अधिक बेहतर व् सकारात्मक विकल्प होगा.

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