आजकल फेसबुक पर एक सन्देश युवाओं और खासकर लड़कियों की 'हॉट चॉईस' बना हुआ है.इस सन्देश में कन्या भ्रूणहत्या रोकने हेतु एक अचूक युक्ति का बड़े जोर-शोर से प्रचार किया गया है, वो रामवाण उपाय है--लड़कियों का पिता की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर विवाह करने से स्पष्ट इंकार कर देना...तभी इस देश में कन्याओं की गर्भ में की जाने वाली हत्याओं को रोका जा सकता है !!
ये अलग बात है कि कन्या भ्रूण हत्या के कारणों की जांच करने वाली किसी सरकारी संस्था अथवा प्रतिष्ठित समाजशास्त्री की बुद्धि अभी तक इस 'महान निष्कर्ष' तक नहीं पहुँच सकी जबकि फेसबुक पर सक्रिय 'विद्वानों' ने अपनी 'प्रतिभा का लोहा मनवाते' हुए इस 'लोकोपकारी' विज्ञापन को गढ़ने में रत्ती मात्र भी विलम्ब नहीं किया और 'चैतन्य' एवं 'संवेदनशील' युवा इस 'महान' सन्देश का प्रचार करने हेतु युद्ध स्तर पर जुट गयेसे प्रतीत हो रहे हैं. ऐसे में मुझे सामयिक लगा कि इस मुद्दे पर मैं भी कुछ लिखूं भले ही मेरी बातें इस विज्ञापन के समर्थकों के गले न उतरें,तब भी.
कन्या भ्रूणहत्या का इतिहास बहुत पुराना है,राजपूताने से लेकर दक्षिण के राज्यों तक इसकी दुखद किन्तु दीर्घ परम्परा रही है. सती प्रथा,जौहर प्रथा,विधवा सामजिक बहिष्कार,पैतृक व् लौकिक अधिकारों से वंचना,समाज में दोयम दर्ज़ा,दहेज़ प्रथा,स्त्री को उपभोग की वस्तु समझना और ऊपर से 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' का खोखला उद्घोष करना ही वाही कारन है जिसके चलते समाज में स्त्री को लेकर दोहरे मापदंडों की स्थापना हुई.
स्त्री शोषण का चक्र बहुत जटिल है,इसे समझे बिना कन्या भ्रूणहत्या के मेकेनिज्म को नहीं समझा जा सकता.
लड़कियां घर से भाग कर शादी करके बाप की नाक न कटवा दें, इसी आशंका के चलते 'कन्या भ्रूणहत्या' को अमलीजामा पहनाया जाता है, ऐसी सोच बेहद संकीर्ण,हास्यास्पद,विद्रूप,साजिशाना हरकत कही जानी चाहिए जो कन्या भ्रूणहत्या के लिए भी खुद स्त्री जाति को ही जिम्मेदार ठहराने हेतु रची गई है.
घिन आती है ऐसे थोथे व् उथले तर्क गढ़ने वालों पर..काश वो अपनी तर्कशील बुद्धि 'कन्या भ्रूणहत्या' को रोकने हेतु एक ठोस एवं कारगर रणनीति के निर्माण हेतु लगाते !!
शर्म आती है... कपड़ों और रहन-सहन से अल्ट्रा मॉडर्न दिखने वाली आधुनिकता का दंभ भरती नवयौवनाओं पर, जो इस तरह के विकृत मानसिकता युक्त संदेशों का बढ़-चढ़ कर प्रसार कर स्वयं को 'स्त्री के विरुद्ध संगठित साजिश' का अंश बना बैठती हैं.
मेरे प्रश्न हैं ------
आतंकवादी,देशद्रोही,ड्रग माफिया,तस्कर,डकैत,हत्यारा,बलात्कारी,भ्रष्टाचारी हो सकने की संभावनाओं के चलते 'बालक भ्रूणहत्या' का चलन प्रारंभ क्यों नहीं हुआ???
क्या, ऐसे पुरुषों के कारण उनके पिता/वंश/घराने के नाम पर बट्टा नहीं लगता????
जाति,समाज,पिता की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी करना क्या दुनिया का एकमात्र सबसे बड़ा अपराध है???
अगर हम इसे भी सत्य मानकर चलें तो एक और प्रश्न है----
विवाह अकेली लड़की तो कर नहीं लेती...कोई न कोई पुरुष भी इस तथाकथित पाप में बराबर का भागीदार होता है, तो सजा सिर्फ लड़की जाति को क्यों?? क्यों सिर्फ कन्या भ्रूणहत्या ही ????
अब कई लोग कहेंगे कि बेटी बाप का मान होती है,नाक होती है,इज्ज़त होती है...आदि,आदि.
ये तमाम तरह के कुतर्क दरअसल स्त्री वर्ग को गुमराह करने व् उसे सतत शोषण चक्र की बेड़ियों में जकड़े रहने देने हेतु रचे गए हैं. जो बेटी तथाकथित रूप से पराया धन होती है,गैर अमानत होती है,घर की संपत्ति से बेदखल होती है,जिसके जन्म पर घंटे-घड़ियाल नहीं बजते,जो पिता का वंश नहीं चलाती,जो पिता का दाह संस्कार तो क्या,उसके अंतिम संस्कार की प्रत्यक्ष साक्षी तक नहीं बन सकती....आखिर वो लड़की, जी हाँ, वही लड़की जब शादी विवाह जैसे नितांत व्यक्तिगत मामलों में अपनी चंद खुशियों को हासिल करने की चाह में यदि दो कदम आत्मनिर्णय के आकाश में बढ़ा उठती है तो अचानक से बाप की नाक क्यों कट जाती है ?? लाख अच्छे कर्मों के बावजूद कभी घर का चिराग न कहलवा पाने वाली लड़की आखिर कैसे घर का अँधकार बन जाती है ?
अनेकों काल्पनिक देवियों को पूजने वाले भारत देश में वास्तविक देवियों के साथ ऐसा पशुवत व्यवहार आखिर क्यों ?? इस रात की सुबह आखिर कब होगी ???????
ये अलग बात है कि कन्या भ्रूण हत्या के कारणों की जांच करने वाली किसी सरकारी संस्था अथवा प्रतिष्ठित समाजशास्त्री की बुद्धि अभी तक इस 'महान निष्कर्ष' तक नहीं पहुँच सकी जबकि फेसबुक पर सक्रिय 'विद्वानों' ने अपनी 'प्रतिभा का लोहा मनवाते' हुए इस 'लोकोपकारी' विज्ञापन को गढ़ने में रत्ती मात्र भी विलम्ब नहीं किया और 'चैतन्य' एवं 'संवेदनशील' युवा इस 'महान' सन्देश का प्रचार करने हेतु युद्ध स्तर पर जुट गयेसे प्रतीत हो रहे हैं. ऐसे में मुझे सामयिक लगा कि इस मुद्दे पर मैं भी कुछ लिखूं भले ही मेरी बातें इस विज्ञापन के समर्थकों के गले न उतरें,तब भी.
कन्या भ्रूणहत्या का इतिहास बहुत पुराना है,राजपूताने से लेकर दक्षिण के राज्यों तक इसकी दुखद किन्तु दीर्घ परम्परा रही है. सती प्रथा,जौहर प्रथा,विधवा सामजिक बहिष्कार,पैतृक व् लौकिक अधिकारों से वंचना,समाज में दोयम दर्ज़ा,दहेज़ प्रथा,स्त्री को उपभोग की वस्तु समझना और ऊपर से 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' का खोखला उद्घोष करना ही वाही कारन है जिसके चलते समाज में स्त्री को लेकर दोहरे मापदंडों की स्थापना हुई.
स्त्री शोषण का चक्र बहुत जटिल है,इसे समझे बिना कन्या भ्रूणहत्या के मेकेनिज्म को नहीं समझा जा सकता.
लड़कियां घर से भाग कर शादी करके बाप की नाक न कटवा दें, इसी आशंका के चलते 'कन्या भ्रूणहत्या' को अमलीजामा पहनाया जाता है, ऐसी सोच बेहद संकीर्ण,हास्यास्पद,विद्रूप,साजिशाना हरकत कही जानी चाहिए जो कन्या भ्रूणहत्या के लिए भी खुद स्त्री जाति को ही जिम्मेदार ठहराने हेतु रची गई है.
घिन आती है ऐसे थोथे व् उथले तर्क गढ़ने वालों पर..काश वो अपनी तर्कशील बुद्धि 'कन्या भ्रूणहत्या' को रोकने हेतु एक ठोस एवं कारगर रणनीति के निर्माण हेतु लगाते !!
शर्म आती है... कपड़ों और रहन-सहन से अल्ट्रा मॉडर्न दिखने वाली आधुनिकता का दंभ भरती नवयौवनाओं पर, जो इस तरह के विकृत मानसिकता युक्त संदेशों का बढ़-चढ़ कर प्रसार कर स्वयं को 'स्त्री के विरुद्ध संगठित साजिश' का अंश बना बैठती हैं.
मेरे प्रश्न हैं ------
आतंकवादी,देशद्रोही,ड्रग माफिया,तस्कर,डकैत,हत्यारा,बलात्कारी,भ्रष्टाचारी हो सकने की संभावनाओं के चलते 'बालक भ्रूणहत्या' का चलन प्रारंभ क्यों नहीं हुआ???
क्या, ऐसे पुरुषों के कारण उनके पिता/वंश/घराने के नाम पर बट्टा नहीं लगता????
जाति,समाज,पिता की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी करना क्या दुनिया का एकमात्र सबसे बड़ा अपराध है???
अगर हम इसे भी सत्य मानकर चलें तो एक और प्रश्न है----
विवाह अकेली लड़की तो कर नहीं लेती...कोई न कोई पुरुष भी इस तथाकथित पाप में बराबर का भागीदार होता है, तो सजा सिर्फ लड़की जाति को क्यों?? क्यों सिर्फ कन्या भ्रूणहत्या ही ????
अब कई लोग कहेंगे कि बेटी बाप का मान होती है,नाक होती है,इज्ज़त होती है...आदि,आदि.
ये तमाम तरह के कुतर्क दरअसल स्त्री वर्ग को गुमराह करने व् उसे सतत शोषण चक्र की बेड़ियों में जकड़े रहने देने हेतु रचे गए हैं. जो बेटी तथाकथित रूप से पराया धन होती है,गैर अमानत होती है,घर की संपत्ति से बेदखल होती है,जिसके जन्म पर घंटे-घड़ियाल नहीं बजते,जो पिता का वंश नहीं चलाती,जो पिता का दाह संस्कार तो क्या,उसके अंतिम संस्कार की प्रत्यक्ष साक्षी तक नहीं बन सकती....आखिर वो लड़की, जी हाँ, वही लड़की जब शादी विवाह जैसे नितांत व्यक्तिगत मामलों में अपनी चंद खुशियों को हासिल करने की चाह में यदि दो कदम आत्मनिर्णय के आकाश में बढ़ा उठती है तो अचानक से बाप की नाक क्यों कट जाती है ?? लाख अच्छे कर्मों के बावजूद कभी घर का चिराग न कहलवा पाने वाली लड़की आखिर कैसे घर का अँधकार बन जाती है ?
अनेकों काल्पनिक देवियों को पूजने वाले भारत देश में वास्तविक देवियों के साथ ऐसा पशुवत व्यवहार आखिर क्यों ?? इस रात की सुबह आखिर कब होगी ???????
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